किताबें कुछ कहना चाहती हैं.. किताबें करती हैं बातें बीते जमानों की, दुनिया की, इंसानों की, आज की, कल की, एक-एक पल की, गमों की, फूलों की, बमों की, गनों की, जीत की, हार की, प्यार की, मार की। क्या तुम नहीं सुनोगे इन किताबों की बातें ? किताबें कुछ कहना चाहती हैं तुम्हारे पास रहना चाहती हैं किताबों में चिड़िया चहचहाती हैं किताबों में झरने गुनगुनाते हैं परियों के किस्से सुनाते हैं किताबों में रॉकेट का राज है किताबों में साईंस की आवाज है किताबों में ज्ञान की भरमार है क्या तुम इस संसार में नहीं जाना चाहोगे? किताबें कुछ कहना चाहती हैं.. तुम्हारे पास रहना चाहती हैं। — सफदर हाशम Booker Prize Winner 2022
मुं शी प्रेमचंद (31 जुलाई 1880–8 अक्तूबर 1936) का जन्म वाराणसी से चार मील दूर लमही गाँव में हुआ था। उनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था।उनकी शिक्षा का आरंभ उर्दू, फ़ारसी पढ़ने से हुआ और रोज़गार का पढ़ाने से। 1898 में मैट्रिक की परीक्षा के पास करने के बाद वह एक स्थानिक पाठशाला में अध्यापक नियुक्त हो गए। 1910 में वह इंटर और 1919 में बी.ए. के पास करने के बाद स्कूलों के डिप्टी सब-इंस्पेक्टर नियुक्त हुए।उनकी प्रसिद्ध हिंदी रचनायें हैं उपन्यास: सेवासदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, गबन, गोदान ; कहानी संग्रह: नमक का दरोग़ा, प्रेम पचीसी, सोज़े वतन, प्रेम तीर्थ, पाँच फूल, सप्त सुमन ; बालसाहित्य: कुत्ते की कहानी, जंगल की कहानियाँ आदि।